Saturday, July 17, 2010

अपने-अपने काम



भारत को ठीक से न समझने वाले अक्सर यह कहते हुए पाए जाते है कि यह देश भगवान भरोसे चल रहा है । यह सही नहीं है । यहाँ प्रत्येक तंत्र अपने-अपने र्मोचे पर मुस्तैदी से खड़ा है । अपनी कार्य शैली से वह निरंतर कुछ न कुछ नया रचता रहता है । इस कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर देखने वाला बरबस ही दांतो तले अंगुली दबा लेता है । 

हम जगत गुरू कहलाते है इसलिये जियो और जीने दो के सिद्धांत पर कार्य करते है । इसलिए हमारे यहाॅ सभी को काम के समान अवसर उपलब्ध    है । हर प्रणाली अपने हिस्से का काम करती है । बिना अपराध के पुलिस का क्या वजूद ? चोरी चकारी के अभाव में पुलिस के पास मक्खी मारने के सिवा और क्या काम है रह जाएगा ! जेबकट, जुआरी पुलिस को धंधा देते है । इन तथ्यों को पुलिस सदैव ध्यान में रखती है । चोर का काम चोरी करना है,जेबकट का काम जेब की सफाई करना है , आतंक वादियों का काम आतंक फैलाना है, इसलिये पुलिस उन्हें उनका काम करने देती है । ऐसा नहीं कि उसे पहले ही पकड लिया बल्कि उन्हें काम के पर्याप्त अवसर दिए जाते है । ऊपर से प्रेशर-ब्रेशर आ जाए तो बात अलग है । पर सामान्यतः पुलिस सभी बातों का ध्यान रखती है । वेश बदलो, पहचान बदलो, सिम खरीदो, सायकिल खरीदो, लंच बाक्स खरीदो, अगर बम बनाना है तो उसका सामान खरीदो आदि । फिर बम कहाँ-कहाँ लगाना है । उसका आराम से निरीक्षण करो । यानि सारी सुविधाएँ, कही कोई कमी नहीं फिर भी न कर पाओ तो तुम जानो सूरत जैसे। अब इसमें गलती किसकी है ? पूरा समय दिया था ना । 

घटना घटित हो जाने के बाद पुलिस का रोल शुरु होता है । पुलिस को कोई फोन लगाता है या वह अखबार ं पढकर  जान जाती है कि फलाॅ जगह पर बम फटा है या जिंदा बम रखा हुआ है । पुलिस घटना स्थल का मुआयना करती है । साथ में कुत्ते भी ले जाती है । मालुम है कि वह थोडी देर तक इधर उधर सूँध- साॅघ कर एक स्थान पर रूक जाएगा पर वह उसे भी अपना काम करने देती है । मुआयना करने के बाद वह कुछ निष्कर्ष निकालती है । वह काफी गंभीर विचार विमर्श के बाद कहती है कि इसी प्रकार के विस्फोट पहले जयपुर या बेगलूरु या अहमदाबाद में भी हुए थे । विस्फोट करने का तरीका भी एक ही है । जो उन्होंने छः महीने , साल भर या पाॅच साल पहले भी इस्तेमाल किया  था । वह घटना के तार कहाँ जुडे है यह पता लगाने की कोशिश करती है। वह ई-मेल चेक करवाती है । जैसी परंपरा है कि कोई आतंकवादी संगठन इसकी जिम्मेदारी ले ही लेता है । यह पता होते ही पुलिस चैन की साॅस लेती है । फिर वह सुरक्षा कडी कर देती है । ज्यादा हुआ तो रेड अलर्ट जारी हो जाता है । आजकल स्क्रेच जारी करने का फैशन चल पडा है । वह स्क्रेच जारी कर लोगों से कहती है ढूढों भैये । इन्होंने ही किया था विस्फोट । इस बीच कहीं दूसरे शहर, कहीं दूसरी घटना घट जाती है । और पुलिस उसे सुलझाने चल पड़ती   है । 

नेता और सरकार का काम है कि इस तरह की घटना की तीखी निंदा करना । कई लोग कड़े से शब्दों मंे भत्र्सना करते है जबकि कुछ सामान्य शब्दों में ही कहते है । अगर सरकार का नुमाइंदा निंदा कर होता है तब वह यह कहने से नही चूकता कि दोषियों को बक्शा नहीं जाएगा । कई बार आपात बैठक बुलवाने का भी रिवाज है । बैठक के बाद घटना के तार कहाँ जुडे है और सरकार शीघ्र ही कठोर कदम उठाएगी आदि कि घोषणा की जाती है । अगर विपक्षी नेता होता है तो वह घटना की कडी से कडी निंदा करने के साथ ही लगे हाथो सरकार के असफल होने का आरोप लगाकर  प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से इस्तीफा माॅग लेता है । ऐसे में अगर केन्द्र तथा राज्य में अलग अलग पार्टी की सरकार हो तो मतभेद उभर कर सामने आते है । केन्द्र  की सरकार कहती है कि यह राज्य सरकार का काम है और राज्य सरकार कहती है कि यह केन्द्र का काम है । 

अब बच जाता है तो आम आदमी। उसका काम है विस्फोट से खुद को बचाना ,  घायल होना या फिर मर जाना । जो मर जाता है वह जीत जाता    है । जो घायल हो जाता है  वह मुआवजे की राशि प्राप्त करते करते व्यवस्था से हार जाता है । 

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