प्रजातंत्र में राजा वैसे ही बेचारा जीव होता है और अगर अल्पमत में हो तो कोढ में खाज जैसी स्थिति हो जाती है। प्रजातंत्र के कारण उसे सबके गिले शिकवे सुनना पड़ते है । राजमाता की मनमर्जी का खास ख्याल रखना पड़ता है । उसके बाद युवराज का नम्बर आता है । इसी के साथ मंत्रियों का भी ध्यान रखना पड़ता है । कुर्सी के चारों पाए संभालना टेढी खीर होती है। अंदर से समर्थन करने वाले नाक में दम किए रहते है बाहर से समर्थन करने वाले छाती पर मूंग दलते रहते है । प्रजा तो है ही समस्याओं का पिटारा । समदृष्टि भी रखना पड़ती है । राजा जो ठहरे । हर तरफ मजबूरी ही मजबूरी । जहाँ एक ओर सत्ता का प्रेशर रहता है वहीं दूसरी तरफ प्रजा का भारी दबाव । प्रजा को अपना राजा चुनने की आजादी जो ठहरी ।
वैसे सरकारी आँकडो की माने तो प्रजा सुख चैन की बंसी बजा रही थी । चारों तरफ विकास ही विकास हो रहा था । विकासशील से विकसित बनने की तरफ देश तेजी से दौड़ रहा था । परमाणु करार का मामला सुलट चुका था । यदा कदा संसेक्स के झटके अवश्य राजमहल तक महसूस किए जाते थे । पर बाबा रे बाबा ये ईयर तो इलेक्शन ईयर है । इस निगोड़ी जनता के मन में क्या छिपा है जानना बहुत कठिन है । अगली चक्कर लालबत्ती, हेलीकाप्टर चइए तो उसके लिए आइडिया भिडाना पड़ेगा और राजा के पास आइडिया की कमी थोडे ही है । राजा जो ठहरे !
ऐसे ही एक फालतू सा दिन दिन भर विभिन्न रंगों के झंडे वालों के साथ मगज पच्ची कर थके हारे राजा महल में लौटकर बड़ी मुश्किल से मिले एकांत का लाभ उठाकर मनसद पर सुस्ता रहे थे । साथ ही किसानों, कर्मचारियों के बारे में धांसू आइडिया की जुगाली करे जा रहे थे । सेकेट्री को भी सख्त हिदायत दे रखी थी कि कोई भी डिस्टर्ब न करें । अचानक एक महीन सी आवाज सुनकर उनके विचारों को ब्रेक लगा ।
कौन है - राजा थके स्वर में बोले ।
जी मैं .......... पहचाना .......... थकी सी आवाज आई ।
नहीं पहचाना .............. कौन ........... ।
गौर से देखिए । मैं मँहगाई हूँ ।
अरे हाँ । याद आया । तूने तो अच्छी हेल्थ बना ली है । बडी मोटी ताजी हो गई है । बहुत दिन हो गए तुझसे रूबरू हुए । जब से राजमहल में आया हूँ कहाॅ मुलाकात हो पाती है । पर आज इधर राजमहल में कैसे ? इधर तो तेरे लिए नो ऐट्री है । अंदर कैसे घुसी ?
बड़ी मुश्किल से छुपते छुपाते पतली गली से आई हूँ । मैं कष्ट में हूँ । फरियाद लेकर आई हूँ महाराज ।
हाॅ बोल ना । जल्दी बता कष्ट क्या है ।
राजन । हाल ही के छठे वेतन आयोग के कारण मेरा सत्यानाश हो रहा है । कई गुना वेतन बढ जाने के कारण मेरा क्या हश्र होगा यह सोचा है आपने । मैं तो बौनी हो गई हूँ इस राक्षस के सामने ।
पर तुझे तो इतने दिनों से भरपूर मौका मिला था कद बढाने का - राजा ने कहा ।
आप हर बार कहते है ना कि मुझे रोकने के लिए कडे+ कदम उठाएँगे इसलिए मैं घबरा जाती हूँ । मेरा कद बढना रूक जाता है । नहीं तो मैं तो आसमान छूना चाहती हूँ ।
अच्छा पहले यह बता कि तू पुर्लिंग है या स्त्रीलिंग ।
राजन में तो खालिस स्त्रीलिंग हूँ । पर आयोग सौ टका पुर्लिंग है । यह मुआ मुझे कहीं का नहीं छोडेगा । मुझे अभयदान दीजिए ।
देख । हमारे राज्य में महिलाओं का विशेष सम्मान होता है । तू मेरे एक सवाल का जवाब दे । उसी में मेरी समस्या का हल भी छिपा हुआ है । एक रेखा है । अगर आपको उसकी छोटा करना है तो क्या करेगी ।
उसे मिटा कर छोटा कर देंगे ।
पर शर्त यह है कि उसे मिटा नहीं सकते । कुछ मजबूरियाँ है । तू नहीं समझेगी ।
राजन मैं अल्पब्ृद्धि हूँ । समझ नहीं पा रही हूँ -मँहगाई कातर स्वर में बोली ।
अरे तू टेन्शन मत ले । एकदम सरल है । एक दूसरी लाइन खींच जो उससे बड़ी हो । कुछ समझी । अरे पगली, मान ले कि पहले वाली रेखा वेतन आयोग है, ये इलेक्शन ईयर है उसे कम नहीं कर सकते पर उसे छोटा करना है .......... ।
ग्रेट राजाजी । व्हाट एन आइडिया । फिर गुस्से से दाँत पिसती मॅहगाई बोली - अब मैं भी देखती हूँ । वेतन आयोग के बच्चे को । इस छटे को छटी का दूध याद न दिला दिया तो कहना । पर इन कडे कदमों का क्या करूॅ । इसका हल भी बतला दो अन्नदाता ।
अरे नादान । वे कदम तेरे आस पास भी फटके कभी ........... । दिल पे मत ले और अब जा पिछवाडे से निकल जा । संभल कर जाना । हो सकता कि सामने से बाहरी समर्थन वाले मांगों की पोटली खोल कर बैठे हो । कहकर राजाजी उसे उन्नति का मार्ग दिखलाकर खुद किसी नई समस्या का समाधान खोजने में व्यक्त हो गए । आइडिया की कमी तो है ही नहीं उनके पास । आखिर राजा जो ठहरे ।

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